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महिलाओं को चाहिये सुरक्षित परिवेश

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अशोक श्रीवास्तव की संपादकीयः पिछले सालों की तरह आज दुनियां विश्व महिला दिपस मना रही है। फेसबुक से लेकर विविध आयोजनों तक, बाहर की दुनियां से लेकर बेडरूम तक आज तक हर जगह महिलाओं को पुरूषों के बराबर हक और इज्जत बख्शी नही जायेगी। कल से फिर वही पुराना ढर्रा। मंच, माइक, माला के बीच आज महिलाओं की तुलना रानी लक्ष्मीबाई, इन्दिरा और कल्पना चावला से की जायेगी।

अगले ही दिन उन पर भेड़ियों जैसी नजर होगी, मौका मिलते ही मन का शैतान बाहर निकल आयेगा। कौन करता है ये सब ? कहां गया ‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते’ वाला संस्कार ? पुरूष होने का गर्व कोई नही छोड़ पा रहा है। लेकिन पुरूष होने के मायने क्या हैं कोई समझने को तैयार नही है। यही कारण है कि बड़े बड़े दावे फुस्स हो जा रहे हैं और आये दिन महिलाओं संग दरिंदगी की घटनायें हो रही हैं। महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा नही दे सकते तो पुरूष होने के दावों का कोई मतलब नही है। तमाम परिवारों में आज भी महिलायें घूंघट में हैं, बाहर की दुनिया से बेफिक्र हैं, उनकी भूमिका खाना बनाने, खिलाने तक सीमित रह गयी है।

उनकी योग्यता, क्षमता और सोच का परिवार, समाज और देश को बिलकुल लाभ नही मिल रहा है। एक दशक पहले लोग कहते थे, महिलायें गणित की जानकार नही हो सकती, महिलायें हवाई जहाज नही उड़ा सकतीं, महिलायें स्पोर्ट में नही जा सकतीं, राजनीति में नही जा सकती, वाहन नही चला सकतीं। महिलाओं ने ये सारे मिथक तोड़ दिये। आज हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपना लोहा मनवाया। महिलाओं ने अपने हिस्से का काम तो कर दिया लेकिन पुरूष अपने हिस्से की जिम्मेदारी नही निभा सका। आज यही संकल्प लेने का दिन है कि महिलाओं को सम्मान की नजर से देखें, उनकी सुरक्षा नही कर सकते तो कम से कम उनके प्रति सोच तो अच्छी रखें।

महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा का अहसास कराकर देखिये, उनकी योग्यता क्षमता चार गुनी बढ़ जायेगी, फिर उन्हे चाहे जिस क्षेत्र में उतार दीजिये पुरूषों से कहीं बेहतर परिणाम लाकर दिखायेंगी। इस दिशा में समाज और सरकार को ठोस प्रयास करने होंगे। बहुत कुछ बदलना होगा। महिला उत्पीड़न मामलों में अदालतों में आज भी पीड़ित महिलाओं को पुरूष अधिवक्ताओं और न्यायमूर्तियों के आगे शर्मसार होना पड़ता है। पुलिस थानों से लेकर अदालतों तक हर प्रकार की पूछताछ पुरूष ही करते हैं। यहां तक कि बलात्कार मामलों में महिलाओं को टू फिंगर टेस्ट से गुजरना पड़ता है। मसलन पीड़ित महिला का दोबारा बलात्कार होता है। इसका प्रतिरोध करना होगा।

दूसरी सबसे बड़ी बात ये है कि महिलाओं के उत्पीड़न मामलों में उनकी सुरक्षा की गारण्टी लेनी होगी, जिससे आरोपी मनमानी तरीके से साक्ष्य कमजोर न कर सके। देर से मिले न्याय का कोई मतलब नही। रेप जैसे मामलों में 10-20-30 सालों तक कौन सी जांच होती है। कुछ मामलों में महज दो तीन हफ्तों में फैसले सामने आये हैं, कुछ मामलों में ऐसा हो सकता है तो सभी मामलों में क्यों नही। हमे इच्छाशक्ति जागृत करनी होगी महिलाओं को समयबद्ध न्याय दिलाने की। ऐसा होने पर दरिंदगी करने वालों में कानून का खौफ पैदा होगा। इतना सब करने के बाद हम महिलाओं को हम सुरक्षित परिवेश दे पायेंगे और उनकी पूरी योग्यता क्षमता देश के निर्माण के काम आ सकेगी।

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