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मुरादनगर मामलाः काफी गहरी हैं कमीशनखोरी की जड़ें

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अशोक श्रीवास्तव की संपादकीयः मुरादनगर मामला भ्रष्टाचार का ज्वलन्त उदाहरण है, सरकार ने अपनी छबि खराब होता देख आनन फानन में कार्यवाही कर दी। लेकिन कमीशनखोरी का मामला जो सामने आया है क्या यह केवल गाजियाबाद में है ? यह एक ज्वलन्त सवाल है। सरकार इन सवालों से चाहे जितना मुंह छिपाये लेकिन वक्त और हालात समय समय पर योगी सरकार से सवाल पूछते रहेंगे।

कुछ लोगों को निलंबित कर या फिर उनके खिलाफ रासुका लगाकर सरकार अपने ऊपर उठ रहे सवालों का रूख मोड़ने की कोशिश कर रही है लेकिन योगी सरकार में भ्रष्टाचार कई गुना बढ़ा है यह कड़वा सच अब बाहर आ गया है। दरअसल ऐसा तब होता है जब सरकार की आंख बंद और कान खुले रहते हैं या फिर कान बंद रहते हैं और आंख खुली रहती है, या फिर दोनो बंद रहते हैं। योगी सरकार को यह कतई नही भूलना चाहिये कि कमीशनखोरी की बीमारी केवल गाजियाबाद में ही नही समूचे उत्तर प्रदेश में हैं। दसमे कोई शक नही कमीशन के जरिये जनता की गाढ़ी कमाई डकार रहे जिम्मेदार परोक्ष अपरोक्ष रूप से सरकार को भी हिस्सा पहुंचाते होंगे, बेशक इसमे सीएम स्वयं न शामिल हों लेकिन उनके नीचे ऐसे बहुत कम होंगे जो इस खेल का हिस्सा न हों। सड़के अबन रही हैं, एक महीने के भीतर टूट जा रही हैं।

बड़े मीडिया हाउस सरकार के पक्ष में लिखने के लिये सौदा कर चुके हैं, गिने चुने मीडिया संस्थान सच्चाई सामने ला रहे हैं तो सरकारी मशीनरी उनके उत्पीड़न में जुटा है। पूरे सिस्टम को रिफार्म करने की जरूरत है। इसके लिये आंख और कान दोनो खुला रखना होगा। खुद अपने कानों से सुनना और अपनी आखों से देखना होगा। अति आत्मविश्वास से घिरी योगी सरकार सही मूल्यांकन नही कर पा रही है। सच्चाई ये है कि जिनकी आखों से वे देखते और जिनके कानों से सुनते हैं वे गलत फीडिंग कर रहे हैं। अफसर यही रहते हैं सरकारें बदल जाती हैं और जब सरकार के बारे में जनता में गलत संदेश चला जाता है तो डैमेज कण्ट्रोल करना बेहद मुश्किल होता है।

गाजियाबाद के मुरादनगर में हुये श्मशान घाट हादसे में 25 परिवारों में पसरा मातम, अनाथ हुये बच्चों की चीख पुकार, अपना सुहाग खो चुकी महिलाओं की पथराई आखों, बदहवाश माओं का दर्द आरोपियों पर रासुका लगाने से नही कम होगा, इसके लिये सरकार को उस पॉलिसी पर ध्यान केन्दिंत करना होगा जिसकी प्रचार प्रसार करने के बाद उसे सत्ता नसीब हुई है। हम जीरो टॉलरेंस की बात कर रहे हैं जो एक एक नागरिक को आज भी याद है। क्या कहा था और क्या हो रहा है। भ्रष्टाचार और पुलिस की मनमानियों ने जनता का सुख चैन छीन लिया है। अब पानी सिंर से ऊपर जा रहा है। 25 बेगुनाहों की मौत सोचने के लिये पर्याप्त है या फिर इससे बड़े हादसे का इंतजार है ? फिलहाल वक्त सवाल भी और वक्त जवाब भी जिसके लिये इंतजार करने की जरूरत है।

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