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पंचायत चुनाव में निर्दलियों की बल्ले बल्ले, जानिये भाजपा की करारी हार की खास वजहें

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यूपी के 75 जिलों की सभी 3,050 सीटों पर हुए जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव परिणाम आ गये हैं। खास बात यह रही कि जीते हुए सदस्यों में सबसे ज्यादा निर्दलीय हैं। अब जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव में मास्टर चाबी निर्दलियों के हाथ आ गयी है। भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री, कैबिनेट मंत्री और तमाम दिग्गज मिलकर भी मतदाताओं का मूड नही बदल सके और भाजपा की करारी शिकस्त हुई।

चुनाव नतीजों से साफ है कि जिला पंचायत अध्यक्ष एवं प्रमुखों के चुनाव में जमकर खरीद फरोख्त होगी। नतीजे ऐसे आये है जो सभी की पोल खोलकर रख देंगे। मसलन बगैर निर्दलियों को अपने पक्ष में किये न सपा अपना अध्यक्ष बना पायेगी और न ही भाजपा। यूपी के 75 जिलों में कुल 3050 सीटों पर हुए चुनाव में बीजेपी और सपा से ज्यादा निर्दलीयों ने जीत दर्ज की। जिला पंचायत सदस्यों के 3047 सीटों में सपा 759, भाजपा 768, बसपा 319, कांग्रेस 125, रालोद 69, आप 64 और निर्दलियों को 944 सीटें मिली हैं।

भाजपा के लिये परेशानी की बात ये है कि निर्दलियों में ज्यादातर वे है जो भाजपा से टिकट न मिलने के कारण निर्दल चुनाव लड़ा। जिलाध्यक्षों की भूमिका पर सवाल खड़े हुये। निजी स्वार्थों अथवा पक्षपातपूर्ण तरीके से टिकट बांटे गये, जमीनी कार्यकर्ताओं का स्वाभिमान टकराया और उन्होने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में नामांकन कर दिया। कई जिलों में बड़ी संख्या में लोग पार्टी से निकाले गये। अब जब निर्दल उम्मीदवारों ने बड़ी संख्या में जीत दर्ज कराया तो भाजपा के लिये उन्हे मनाना मुश्किल हो रहा है।

फिलहाल चुनाव नतीजों पर भाजपा को मंथन की जरूरत है। कहते हैं पुचायत चुनावों से विधानसभा का मार्ग प्रशस्त होता है, इसीलिये इन चुनावों को विधानसभा का सेमीफाइनल कहते हैं जिसे भाजपा की पोजीशन बेहद खराब रही। हार के असली वजह जानकर शीर्ष नेतृत्व ने समीक्षा नही किया तो 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में तस्वीर ज्यादा बदलेगी नहीं। बल्कि पंचायत चुनाव में आये नतीजों के इर्द गिर्द ही उपलब्धियां रह जायेंगी, ऐसे में सरकार बनाने के लिये नाको चने चबाने पड़ेंगे। फिलहाल आई समझते हैं कि भाजपा के कार की खास वजहें आखिर क्या थी ?

नफरत की राजनीति

पछले सात सालों से जनता में दूसरे दलों के प्रति सत्ताधारी दल और नेता नफरत भर रहे हैं। राजनीति में जो नया कल्चर फिट करने की कोशिश की जा रही है उसे जनता ने नकार दिया है। हिन्दुत्व और राम मंदिर को भाजपा पूरी तरह भुना चुकी है। दीदी ओ दीदी, पप्पू, बुआ बबुआ जैसे घटिया सम्बोधनों ने लोगों के भीतर सिर्फ नफरत भरा है। ऐसे सम्बोधन किसी सड़क छाप के ही हो सकते हैं। निश्चित रूप से शुरूआती दौर में जनता ने इन्हे पसंद किया, न चाहकर भी लोगों ने परिवर्तन की इच्छा से वोट किया, लेकिन तमाम कीमतें चुकाने के बाद जनता को सिर्फ दुश्वारियां मिली। अब तो जनता एक एक शब्द और भाषणों के दौरान चमकाने चिढाने वाले बॉडी लैग्वेज के मायने जान चुकी है, इसका असर नतीजों पर दिख रहा है, आगे और दिखेगा।

किसान आन्दोलन से हारी भाजपा

कृषि कानूनों से आम जनता शायद उतनी नाराज नही थी जितनी आन्दोलित किसानों को आतंकवादी, देशद्रोही कहने से नाराज हुई। आन्दोलन कर रहे किसानों की बिजली पानी की सप्लाई काट दी गयी। उनकी राह में कील, कांटे बिछाये गये। हिंसा की साजिश रचकर किसानों को आरोपी बनाने की पुरजोर कोशिश हुई। किसानों के अपमान, आन्दोलन का लोकतांत्रिक अधिकार छीनने जैसी कार्यवाहियों ने न सिर्फ किसानों का बल्कि आम जनता भी भाजपा से मांहभग किया।

कोरोना काल में अव्यवस्था

कोरोना काल में अस्पतालों की व्यवस्था सुधारने, मरीजों का आक्सीजन और बेड उपलब्ध करवाने में सरकार फेल रही। मरीज अस्पताल परिसर में दम तोड़ते रहे, सरकार चाक चौबंद व्यवस्था के दावे करते रही। चुने हुये जन प्रतिनिधियों ने महामारी काल में मौन साध लिया। वे न तो अव्यवस्था पर बोले और न ही इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे मरीजों की मदद को आगे आये। व्यवस्था का आलम ये है कि अस्पताल से तीमारदारों को बेइज्जत कर भगाया जाने लगा। कोरोना की पहली लहर के बाद सरकार ने ऐसी महामारी से देशवासियों को बचाने के लिये कोई ठोस प्रयास नही किया। मास्क, सेनेटाइजर व अन्य मेडिकल उत्पादों की खरीददारी और वितरण को लेकर सोशल मीडिया पर सरकार घिरती रही।

जमीनी कार्यकर्ताओं की तौहीन

किसी भी पार्टी की पहचान उसके समर्पित कार्यकर्ताओं की बदौलत होती है, और भाजपा न केवल अपने कार्यकर्ताओं का स्वाभिमान बचाने में फेल रही बल्कि चुनाव का समय आया तो उन्हे टिकट न देकर जिलाध्यक्षों ने मनमानी की और ऐसे लोगों को टिकट दिया जो उनके करीबी थे अथवा जो उन्हे अपने पक्ष में कर पाये। वर्षों से पार्टी को अपना योगदान दे रहे कार्यकर्ता हाशिये पर नजर आये। कार्यकर्ताओं ने भी ऐन मौके पर बागी तेवर अपनाया और निर्दल चुनाव लड़कर पार्टी को अपनी ताकत दिखा दी। पार्टी इससे सबक लेती है या अहंकार के नशे में पुराना तेवर कायम रहेगा, ये वक्त बतायेगा।

स्थानीय नेताओं की निष्क्रियता

चुनाव प्रचार में स्थानीय नेताओं की निष्क्रियता भी पंचायत चुनाव में अपेक्षित परिणाम न आने की खास वजह है। दरअसल चुनाव ऐसे मौके पर हुये जब चारों ओर कोरोना को लेकर कोहराम मचा था। स्थानीय प्रशासन, सरकार और अस्पताल की व्यवस्थाओं पर अनेकों सवाल उठ रहे थे। चुने हुये विधायकों और सांसदों को इस बात का अहसास हो गया था कि ऐसे मौके पर जनता के बीच जाना अपनी भद पिटवाना है। इसलिये उन्होने अपने को प्रचार से अलग रखा।

पीएम केयर फंड पर सवाल

जनता भयंकर त्रासदी झेल रही है। कोरोना की भयावहता पिछली लहर से कई गुना ज्यादा है। जनता पीएम केयर फंड पर सवाल उठा रही है। पीएम केयर फंड का हिसाब नही दिया गया। अथाह धन आया, लोगों ने दिल खोलकर दान दिया लेकिन उन पैसों का क्या हुआ किसी को नही मालूम, लोग बताते हैं पीएम केयर में इतना पैसा आया कि उससे देश में स्वास्थ्य से जुड़े संसाधनों का चार गुना बढ़ाया जा सकता था। ऐसा क्यों नही किया गया ? पारदर्शिता का पूरी तरह अभाव था। यही कारण है कि कोरोना की दूसरी लहर में पीएम केयर फंड में सहयोग देने की अपील करने का साहस किसी में नही हो रहा है। अब एक सवाल के सैकड़ों जवाब हैं और जनता देने का तैयार बैठी है। बेहतर हो जिनके हाथों में देश की सत्ता वे अपने राजनीतिक कल्चर का गहन मंथन करें, जनता की बुनियादी जरूरतों को समझे और बेवजह परेशान करने वाले कायदे कानून न लाये जो जनता से सामान्य जीवन जीने का भी हक छीन ले।

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