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कोरोना से भी तेज हैं चुनावी रैलियां, 130 करोड़ जनता पर भारी पड़ेंगी ये मनमानियां

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अशोक श्रीवास्तव की संपादकीय- कोरोना की पहली लहर का मंजर सभी ने देखा है। लोग भयभीत थे, सरकार भी ज्यादा संवेदनशील थी, अधिक से अधिक लोग कोविड प्रोटाकाल का पालन करते थे, लेकिन दूसरी लहर में जितनी लापरवाहियां हो सकती हैं की जा रही हैं। बात चाहे आम जनता की हो या सरकारों की अथवा जन प्रतिनिधियों की कोई इसे गंभीरता से नही ले रहा हैं।

ये एक बड़ी वजह है जिसके कारण कोरोना वायरस के संक्रमण की रफ्तार पहले से कई गुना तेज है। वैज्ञानिकों ने शोध रिपोर्ट जारी कर बताया है कि वायरस की प्रजनन क्षमता पहले से कई गुना ज्यादा है, लापरवाहियां भी कई गुना बढ़ी हैं इसलिये दूसरी वेव में संक्रमण काफी तेज फैल रहा है। पूरा देश जानता है प्रोटोकाल की अनदेखी कर दिल्ली में 200 जमाती इकट्ठा हुये थे, यहां से आरोप लगा कि वे देश के अलग अलग हिस्सों में फैलकर लोगों को संक्रमित कर रहे हैं। हालांकि ये पुष्ट नही हुआ। लेकिन एक बहुत बड़ी आबादी ने उन्हे आतंकवादी, देश का गद्दार और ना जाने क्या क्या कहा। अब उनकी जुबान को सांप सूंघ गया है, वे मौन धारण कर लिये हैं।

हरिद्वार में कुम्भ के पहले दिन 17 लाख से ज्यादा श्रद्धालु इकट्ठा हुये, न कोई प्रोटोकाल और न ही संवेदनशीलता। बस बेपरवाही, वह भी जितनी हो सकती है उतनी। आलम ये है कि उत्तराखण्ड सरकार सीधे तौर पर कुम्भ के समाप्ति की घोषणा कर साधुओं के निशाने पर नही आना चाहती। प्रधानमंत्री स्वयं दो दिन से मान मनौव्वल में जुटे हैं। कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि से बात कर कुंभ को खत्म कर उसे सिर्फ प्रतीकात्मक तौर पर सीमित रखने की अपील की है। निरंजनी और आनंद अखाड़ा ने अपनी ओर से कुंभ समाप्ति की घोषणा पहले ही कर दी है।

लेकिन, कुछ अखाड़े समय से पहले मेला समाप्ति की बात से नाराज हैं। उनका कहना है कि मेला तय समय तक ही चलेगा। इन साधु-संतों को मनाने के लिए उत्तराखंड सरकार पिछले दो दिनों से गुप्त बैठकें कर रही है। लेकिन, फिलहाल अभी सभी अखाड़ों में सहमति बनती नहीं दिख रही है। सबसे ताकतवर माने जाने वाले जूना अखाड़े ने साफ कर दिया है कि वह समय से पहले कुंभ खत्म नहीं करेगा और 27 अप्रैल के शाही स्नान में अखाड़े के सभी साधु हिस्सा लेंगे। महंत गिरी ने कहा कि ’कुंभ एक धार्मिक आयोजन है। अखाड़े इसके आयोजक हैं। इसलिए अगर सरकार भी चाहे तो बिना अखाड़ों की सहमति के कुंभ नहीं बंद कर सकती।

जूना अखाड़े के नागा साधु गजेंद्र गिरी भी महंत हरि गिरी की बात का समर्थन करते हुए कहते हैं, ’12 साल में एक बार पूर्णकुंभ होता है, चुनाव हर पांच साल में होता है। बंद करवाना है तो पहले चुनावी रैलियां बंद हों।’ निर्मोही अखाड़े के अध्यक्ष महंत राजेंद्र दास कहते हैं, ’अखाड़ों को बनाने का पहला मकसद धर्म की रक्षा करना है। साधु-संतों के लिए कुंभ एक महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है। कुंभ पूरा होगा। 27 अप्रैल का शाही स्नान पूरा किया जाएगा।’ निरंजनी अखाड़े की कुंभ की समाप्ति की घोषणा पर उन्होंने कहा, यह उनका व्यक्तिगत निर्णय है। कुंभ में 13 अखाड़े हैं। इसलिए उनके जाने से कुंभ रुकेगा नहीं।’

धर्म क्या है, क्यों बना है, किस बुनियाद पर खड़ा है, इसमें मानवता की कोई जगह है या नही, इन सब सवालों की गहराई में मै नही जाना चाहता। लेकिन यह कहने में कोई गुरेज नही करूंगा कि जो धर्म समूची मानवता पर संकट बनकर खड़ा हो उसके मायने समझने आसान नहीं हैं। वर्तमान देश काल परिस्थितियां ऐसी है जिसमे बगैर विषयांतर हुये सीधे सवाल बनता है कि इस वक्त शाही स्नान जयरी है या देख को महांमारी के भयानक दौर से बचाना जरूरी है। 200 तब्लीगी जमातियों को देश का दुश्तन कहा गया था तो इन साधुओं को क्या कहा जाये जिसकी नजर में देश के प्रधानमंत्री की अपील भी अहमयित नही रखती। यहां यह कहना जरूरी है कि अयोध्या में रामनवनी मेले में बाहरी श्रद्धालुओं के प्रवेश पर सीएम योगी और वहां के संतों ने रोक लगाकर समूची मानवता के हित में बेहद सराहनीय कदम उठाया था।

फिलहाल प्रधानमंत्री द्वारा की गयी कुम्भ समाप्त करने की अपील पर कुछ नाराज साधुओं ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका कहना है कि पहले चुनाव पर रोक लगाओ तब कुम्भ रोकने की बात करो। बात अपनी जगह पर सोलह आने सच है। दरअसल जितनी रफ्तार कोरोना की है उससे तेज रफ्तार प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रैलियों की है। कहते हैं लापरवाही पर कोरोना अटैक करता है, और लापरवाही देखनी हो तो आप चुनावी रैलियों और शाही स्नान का दर्शन जयर करियेगा। इसके बाद आप सवाल नही पूछेंगे कि आखिर कोरोना इतना शक्तिशाली कैसे हुआ है।

अगले 8 दिनों में मोदी की 6, अमित शाह की 10 और ममता बनर्जी की 17 रैलियां हैं। ये कितने बड़े देशभक्त हैं और देश की जनता से इनका कितना लगाव है आपको बताने की जरूरत नही है। जिस देश का शासक इतनी बड़ी बड़ी रैलियां कर रहा है खास तौर से उस वक्त जब कोरोना वायरस पूरे देश को निगल जाना चाहता है आप उसे क्या कहेंगे, रहनुमा या सत्ता का लोभी। अब बात करते हैं चुनाव आयोग की जिसकी जिम्मेदारी है इन्हे नियंत्रित करना। फिलहाल ये जिम्मेदारी तो आयोग भूल चुका है, देश में जिस तरह से दोहरी नीतियां अपनाई जा रही है और आयोग मौन रहता है ये किसी से नही छिपा है।

लेकिन इतने बुरे हालात में चुनाव कराने की मूर्खता का दण्ड भोगने के लिये देशवासियों को तैयार रहना होगा। सीधा सवाल है जब कोविड प्रोटोकाल का पालन कराने में चुनाव आयोग अक्षम है तो उसे ऐसे हालातों में चुनाव कराने की जरूरत क्या थी, क्या ऐसी परिस्थितियों में राजयपाल शासन लगाकर चुनाव को कुछ महीनों के लिये टाला नही जा सकता था। फिलहाल नीति नियामक जब मूर्ख हो जाते हैं और चुनाव आयोग जैसी संस्थायें सत्ता की चकारी करने लगती हैं तो निशाने पर 130 करोड़ जनता होती है। इन मनमानियों का कोई विकल्प हमारे पास नही है इसलिये हम कोई रास्ता भी नही सुझा सकते। सिर्फ एक बात कहेंगे जो आपके हाथ में है, कोविड प्रोटोकाल का बगैर किसी दबाव के खुद ही पालन करें, यह हमेशा याद रखें कि आपका जीवन आपके परिवार के लिये कितना महत्वपूर्ण है।

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