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अशोक श्रीवास्तव की संपादकीय ‘‘पुलिस पब्लिक और अपराध’’

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हम हमेशा कहते आये हैं कि 75 फीसदी अपराध पुलिस की वजह से हैं। फर्जी मुकदमों में निर्दोषों को फसाना, आपराधिक मामलों में अक्सर गलत का पक्ष लेना, रिश्वत लेकर मनमानी करना और सच को परेशान करना, बेवजह जांच प्रक्रिया को लम्बित करना तमाम अपराधों की वजह है। पुलिस खुद नही चाहती कि अपराध और अपराधी कम हों।

सशक्त नेटवर्क और हर गांव शहर में मुखबिर होने के बावजूद पुलिस आये दिन लोगों को फर्जी मुकदमे में फसा देती है। आपने अक्सर देखा और सुना होगा, पुलिसवाले अक्सर दो प्रकार की धमकी देते है, पहली फर्जी मुकदमे में फसाने और दूसरी बंद करने की। दोनो में पारंगत होना ही शायद बेहतर पुलिसिंग समझी जाती है। यही कारण है कि देश की आजादी के 75 सल होने के बाद भी पुलिस के प्रति जनता की धारणा नही बदली। सम्भ्रान्त जन तो इनके निकट नही जाना चाहते। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाये तो पुलिस का व्यवहार निहायत आपत्तिजनक रहता है। पुरूष हों या महिलायें किसी के साथ ये सम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल नही करते।

जबकि देश के नागरिकों को समझाया जाता है कि पुलिस भी आपके बीच है, इसी समाज का हिस्सा है। काश! यही बात वे खुद समझ जाते तो उनका व्यवहार बदल जाता। हमारे व्यवहार का समाज पर क्या असर पड़ता है, हमारी भाषा और दुर्व्यवहार के समाज पर क्या साइड इफेक्ट हैं यही समझ आ जाये तो पुलिस क्या हर कोई खुद को एक अच्छा नागरिक बना सकता है। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसको जानकर आप समझ जायेंगे कि पुलिस की घटिया कार्यशैली का इस समाज पर क्या असर पड़ रहा है। मामला जिले के पैकोलिया थाने का है। करीब एक साल पहले यहां थाना प्रभारी के रूप में संजय कुमार तैनात थे।

मदनापुर गांव निवासी दिलीप सिंह के खिलाफ मई 2019 में जमीन से जुड़े एक मामले में मारपीट का मुकदमा दर्ज किया गया था। थानाध्यक्ष ने कचहरी परिसर से दिलीप सिंह को गिरफ्तार कर दूसरे दिन जेल भेज दिया और गिरफ्तारी थाना क्षेत्र के मुकुन्दपुर पुलिस से दिखाई। इतना ही नही साथ में अवैध असलहे की बरामदगी भी दिखा दी। जेल से छूटकर आने के बाद दिलीप सिंह ने मानवाधिकार को पत्र लिखकर पूरी सच्चाई बताई। मानवाधिकार एक्शन में आया और और मामले की जांच पुलिस अधीक्षक संत कबीरनगर को सौंपी। रिपोर्ट वही आया जिसके हम दावे करते आ रहे हैं।

अभियुक्त से अवैध असलहे की बरामदगी नही हुई थी बल्कि थाना प्रभारी संजय कुमार ने अपना घटिया चरित्र दिखाते हुये मारपीट के मामूली प्रकरण में अवैध असलहा दिखाकर एक सामान्य व्यक्ति को अपराधियों की लाइन में खड़ा कर दिया। उसकी छबि खराब हुई, समाज उसे अपराधी की नजर से देखने लगे, सबकी नजरों में वह गिर गया। पुलिस अधीक्षक संतकबीर नगर की जांच निष्पक्ष न होती तो दिलीप सिंह सिर उठाकर कभी समाज में नही चल पाता। यह अकेले दिलीप सिंह का मामला नही है। भारत में अनेकों ऐसे फर्जी मामले रोजाना दर्ज होते हैं।

अपराधी पुलिस थानों में ऊची कुर्सी पाता है और सामान्य व्यक्ति सलाखों के पीछे चला जाता है। थानाध्यक्ष संजय कुमार को मामले में ज्यादा से ज्यादा सस्पेन्ड कर दिया जायेगा। लेकिन सवाल ये है कि झूठा अपराधी बनाने से दिलीप सिंह ने जो खोया है क्या वह उसे वापस मिल जायेगा। यदि नही उससे कम सजा संजय कुमार की नही होनी चाहिये जितनी दिलीप सिंह को मिली थी। हमारे सज्ञान में ऐसे अनेक मामले आते हैं जिनसे हमारे उन दावों की पुष्टि होती है जो हमने संपादकीय के पहले हिस्से में किया है। बेहतर होगा कि पुलिस अपना आचरण व्यवहार बदले और खुद का समाज का हिस्सा कहने की बजाय बनकर भी दिखाये।

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